आस्था के दो रूप हेमकुंड और लोकपाल

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हेमकुंड साहिब समुद्र स्तर से 4329 मीटर की ऊचांई पर स्थित है। सिखों के पवित्र तीर्थ हेमकुंड साहिब और झील चारों तरफ बर्फ से ढकी सात पहाड़ियों से घिरे हुए हैं। इस पवित्र स्थल को पहले लोकपाल जिसका अर्थ है विश्व के रक्षक कहा जाता था।
यह हिममंडित सात शिखरों के बीच पवित्र एवं सुदंर सरोवर है। यहां पर सिखों का पवित्र स्थल हेमकुडं तथा हिन्दुओं का लक्ष्मण मदिर लोकपाल है। मान्यता है कि लक्ष्मण ने भगवान राम की आज्ञा का उल्लघन किया था। इस अपराध के प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने इस सरोवर के किनारे तपस्या की थी। तभी से यहां का नाम लोकपाल पड़ा। दूसरी जनश्रुति है कि सिखों के दसवें गुरू गोविन्द सिंह ने पूर्वजन्म में यहां तपस्या की थी। यह गुरू गोविन्द सिंह के विचित्र नाटक में वर्णित है-

अब मै अपनी कथा बखानोे, तप जिहि विधि इह आनो।
हेमकुंड परबत है जहां, सप्त श्रृग सोभित है तहां।

सिखे के पवित्र स्थल हेमकुंड के रूप में ढूढने का श्रेय हवलदार सोहन सिंह को है। सन् 1930 में सोहन सिंह को कही से पता लगा कि सप्त श्रृगों से धिरा सरोवर गढ़वाल में इस स्थान पर है। वह स्थानीय लोगों के साथ यहां तक पहुंचा तथा सर्वप्रथम सिखे के पवित्र स्थल के रूप में इस सरोवर के दर्शन किए। यहां पर लक्ष्मण का एक छोटा सा मन्दिर पहले से था। लक्ष्मण ने यहां पर तप किया था।

इस जगह को रामायण के समय से मौजूद माना गया है। कहा जाता है कि लोकपाल वही जगह है जहां श्री लक्ष्मण जी अपना मनभावन स्थान होने के कारण ध्यान पर बैठ गए थे। कहा जाता है कि अपने पहले के अवतार में गोविन्द सिंह जी ध्यान के लिए यहां आए थे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी आत्मकथा ‘बिचित्र नाटक’ में इस जगह के बारे में अपने अनुभवों का उल्लेख किया है।

हेमकुंड साहिब गुरूद्वारा के कपाट खुलते हैं तो उत्साहित श्रद्धालुओं के ‘जो बोले सो निहाल संत श्री अकाल’ के नारों से पूरा तीर्थ स्थल गुंजायमान हो जाता है।

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